एक हथिनी माँ का अटूट प्रेम अपने बच्चे के लिए जो कई वर्ष बीत जाने के बाद भी अपने मृत बच्चे को याद कर उसके कब्र तक खींची चली आती है अपने बच्चे के कब्र के पास जोर जोर से चिंहाड़ती है चिंहाड़ने की आवाज सुनते ही गांव के लोग घरों को छोड़ फरार हो जाते है.ये कहानी है सरगुजा जिला मुख्यालय अंबिकापुर से करीब 10 किलोमीटर दूरी पर बसा गांव घंघरी के आश्रित मोहल्ला आसडांड की.12 साल पहले आसडाँड़ में रहने वाले ग्रामीण सुकून की जिंदगी बिता रहे थे.जंगल किनारे गांव रहने के बावजूद लोगों को हाथियों से डर नही था.हाथियों का दल गांव जरूर पहुंचता लेकिन दल रुक कर अपने रास्ते चले जाते.लेकिन एक मनहूस रात आंसडांड के लोगों की जिन्दगी में कहर ला दिया इस मनहूस रात को याद कर ग्रामीण आज भी सहम उठते है .उस रात के बाद जब भी गांव में हाथियों की आमद होती है गांव में तबाही होती है ग्रामीणों के जहन में डर का मंजर होता है.ग्रामीण सन 2012 की उस मनहूस रात को कभी नही भूल सके है जिस रात हथिनी के मासूम बच्चे की मौत हुई थी .

दरअसल जिस रात हथिनी के बच्चे की मौत हुई उस रात आसडांड में हाथियों का दल पहुंचा दल में हथिनी के साथ उसका बच्चा मौजूद था इस दौरान एक ऐसी घटना घटी की हाथी के बच्चे की मौत हो गई ग्रामीण बताते है की बच्चा गलती से पुआल के साथ कीटनाशक दवा का सेवन कर लिया जिसकी वजह से हाथी के बच्चे की मौत हो गई.मौत के बाद हाथी के बच्चे के शव को उसी गांव के अमलीपतरा में दफन कर दिया .. उस रात के बाद हर साल हथिनी मां अपने बच्चे की याद कर बच्चे के कब्र के पास पहुंचती है कब्र के पास हाथियों का दल चिहाड़ने लगता है चिंहाड़ने की आवाज सुनते ही ग्रामीण घर छोड़ फरार हो जाते है महीनों तक हाथी डेरा जमाये रखते है तबाही मचाने के बाद चले जाते है ये सिलसिला हर साल होता है

हाथी के जानकार की माने तो हाथियों में संवेदनाएं देखी गई है इसके साथ ही हाथियों में याददाश्त की शक्ति बहुत तेज होती है.अगर हाथी का बच्चा उस गांव में दफन है तो मां हथनी का उस जगह पर पहुंचना कोई संसय वाली बात नही है अक्सर हाथियों के दल की मुखिया हथनी को ही देखा गया है जिसके इशारे में पूरा हाथियों का दल चलता है.बहरहाल प्रेम सिर्फ इंसानों में ही नहीं जानवरों में भी देखा गया है जिसका एक उदाहरण मां हथनी है जो अपने मृत बच्चे की याद में हर साल अपने बच्चे की कब्र तक खींची चली आती है और ग्रामीणों को मां हथनी के क्रोध का सामना हर साल करना पड़ता है ग्रामीण उस रात के हादसे को याद कर सहम जाते है सोचते है उस रात हाथी के बच्चे की मौत नहीं होती तो हर साल तबाही का मंजर नहीं देखना

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