अंबिकापुर: आज के दौर में छोटी-सी बात पर लोग थाने कचहरी तक पहुंच जाते हैं..लेकिन छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले का मैनपाट एक अलग ही तस्वीर दिखाता है.. यहां बसे तिब्बती शरणार्थी समाज ने ऐसा उदाहरण पेश किया है..जिससे दुनिया सीख सकती है..न कोई थाने की नौबत आती है और न ही कोर्ट के चक्कर. विवाद अगर होता भी है तो दलाई लामा की तस्वीर के सामने क्षमा मांगकर खत्म कर दिया जाता है..

हरी भरी वादियों में बसा सरगुजा का खूबसूरत मैनपाट जिसे लोग छोटा तिब्बत भी कहते है 1962 में चाइना-तिब्बत युद्ध के दौरान यहां तिब्बती शरणार्थियों ने शरण ली थी..आज 7 कैंप में करीब 7 हज़ार से अधिक तिब्बती शरणार्थी रहते हैं..खास बात ये है कि तिब्बती शरणार्थीयो का विवाद पुलिस थाने तक नहीं पहुंचा.अगर कभी आपसी मनमुटाव होता भी है  तो पहले कैंप लीडर बीच-बचाव कर सुलह करा देते हैं… और यदि उससे भी बात नहीं बनी तो तिब्बती सेटलमेंट ऑफिसर के हस्तक्षेप से मामला शांत कर दिया जाता है..अंत में दोनों पक्ष दलाई लामा की तस्वीर के सामने खड़े होकर अपनी गलती स्वीकारते हैं और हाथ जोड़कर माफी मांगते हैं स्थानीय लोगों का मानना है कि तिब्बती समाज शांति प्रिय है न कभी विवाद किया न ही पुलिस-कोर्ट तक जाने की नौबत आई ..यहां के लोग बाकी समाज के साथ भी भाईचारे से रहते हैं

भारत के लिए तिब्बती समाज के दिल में खास जगह है.. चाइना-तिब्बत युद्ध के दौरान भारत ने जो मदद की उसे ये लोग कभी नहीं भूले है यही वजह है कि मैनपाट के कई युवा भारतीय सेना में भर्ती होकर देश की सेवा कर रहे हैं..तिब्बती सेटलमेंट ऑफिसर का कहना है  दलाई लामा ने हमेशा शांति का संदेश दिया है.. इसी कारण समाज के लोग आपसी झगड़े में समय बर्बाद करने के बजाय एक-दूसरे को क्षमा कर देते हैं.. उनका मानना है कि असली लड़ाई अपने बीच नहीं बल्कि देश के दुश्मनों से होनी चाहिए

जहां आज छोटी-छोटी बातों पर लोग थाने और कोर्ट तक पहुंच जाते है वहीं मैनपाट का तिब्बती समाज दुनिया को शांति और भाईचारे की सीख दे रहा है।

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